हरिनामामृत व्याकरण

यह एक अद्भुत ग्रन्थ है। इसका पाठ करते समय पाठकों को हरिनामामृत पान करने का अवसर मिलता है। इसके मंगलाचरण श्लोक में जीव गोस्वामी ने लिखा है कि जिस प्रकार श्री कृष्ण की उपासना करने वाले भक्त हरिनाम की माला की सहायता से नाम जप करते हैं, उसी प्रकार मैंने इस व्याकरण में सूत्रों की सहायता से भगवन नाम का उच्चारण या स्मरण होता है। सकेत, परिहास, पादपूरण या अनायास हरिनाम लेने से भी समस्त पापों का नाश होता है। इसलिए इस व्याकरण का अन्य व्याकरणों की अपेक्षा विशेष महत्त्व है। ‘सूत्रमालिका’ और ‘धातुसंग्रह’ स्वतन्त्र ग्रन्थ न होकर हरिनामामृत व्याकरण के ही दो अध्याय हैं।
षट-सन्दर्भ
षट् सन्दर्भ के अन्तर्गत पृथक्-पृथक् छय सन्दर्भ हैं- तत्व, भगवत्, परमार्थ, श्रीकृष्ण, भक्ति और प्रीति। इसलिए इसे षट्-सन्दर्भ कहते हैं। यह सभी सन्दर्भ श्रीमद्भागवत की तत्वव्याख्या स्वरूप हैं, इसलिए इन्हें ‘भागवत-सन्दर्भ’ कहते हैं।
ग्रन्थ के मंगलाचरर में जीव गोस्वामी की उक्ति है-“भगवान का तत्त्व प्रकाशित करने के लिए रूप सनातन ने मुझे इस ग्रन्थ की रचना में प्रवृत्त किया है। वृद्ध वैष्णादि द्वारा रचित ग्रन्थों का उनके किसी दाक्षिणात्य भट्ट बन्धुने सार संकलन कर एक ग्रन्थ प्रणयन किया है, जो कहीं-कहीं खण्डित है, कहीं क्रमानुसार है और कहीं बिना किसी क्रम के । उसी ग्रन्थ की पर्यालोचना कर क्षुद्र जीव ने उसे क्रमानुसार लिखा है।”
वृद्धवैष्णवों से जीव गोस्वामी का अभिप्राय श्रीमन्मध्वाचार्य; श्रीधर स्वामी आदि प्राचीन वैष्णवाचार्यों से है और दाक्षिणात्य भट्ट बन्धु से उनका अभिप्राय श्रीपाद गोपालभट्ट गोस्वामी से है, जैसा कि बलदेव विद्याभूषण ने तत्व-सन्दर्भ की टीका में कहा है। इससे स्पष्ट है कि मूल रूप से इस ग्रन्थ का प्रणयन किया श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी ने। उसे पूर्ण कर क्रमबद्ध किया और उसकी पर्यालोचना कर उसे अन्तिम रूप दिया श्रीजीव गोस्वामी ने। श्रीजीव ने प्रत्येक सन्दर्भ के आरम्भ में यह लिखकर इस बात को दोहराया है-
तस्याद्यं ग्रन्थालेख्यं क्रान्तव्युत्क्रान्त खण्डितम्।
पर्यालाच्यात पर्यायं कृत्वा लिखित जीवक:॥
जीव गोस्वामी द्वारा मंगलाचरण में गोपालभट्ट गोस्वामी का नाम न लिखे जाने और केवल रूप सनातन के बन्धु दाक्षिणात्य भट्ट लिखकर उनका संकेत किये जाने का कारण यह हो सकता है कि उन्होंने दैन्यवश अपना नाम लिखने के लिए जीव गोस्वामी को उसी प्रकार निषेध कर दिया हो, जिस प्रकार उन्होंने चैतन्य-चरितामृत के लेखक को अपने सम्बन्ध में कुछ भी लिखने का निषेध किया था।
तत्व-सन्दर्भ इस सम्बन्ध में जीव गोस्वामी ने प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमानादि, जितने भी प्रमाण हैं, उनमें से केवल शब्द प्रमाण को ग्रहण किया है, बाक़ी सबको दोषयुक्त ठहराया है। शब्द प्रमाण में भी श्रीमद्भागवत का श्रेष्ठत्वं सिद्ध किया है। उसे ब्रह्मसूत्र का व्यासदेव द्वारा स्वरचित भाष्य माना है। इसलिए उन्होंने ब्रह्मसूत्र के भाष्य की पृथकरूप से रचना का प्रयोजन अस्वीकार करते हुए भागवत सन्दर्भ की श्रीमद्भागत्के की भाष्यरूप में रचना की है।
भागवत सन्दर्भ
इस सन्दर्भ में परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन किया गया है। परब्रह्म अद्वय है, अर्थात् स्वजातीय, विजातीय और स्वगत भेदरहित है। जीव और जगत् उसी की शक्ति का परिणाम है। उसकी अनन्त शक्तियाँ हैं, जिनमें तीन प्रधान हैं-चित्-शक्ति या स्वरूप-शक्ति, जीव-शक्ति और माया शक्ति। चित्-शक्ति का प्रकाश है उसके धाम, परिकर और लीलादि, जीव-शक्ति का प्रकाश है जीव, और माया-शक्ति का प्रकाश है जगत्।
ब्रह्म की स्वरूप
शक्ति के विकास-क्रम के अनुसार उसके अनन्त रूप हैं, जिनमें तीन मुख्य हैं-ब्रह्म, परमात्मा और भगवान। ब्रह्म में स्वरूप-शक्ति का न्यूनतम विकास है, केवल उतना ही, जितना सत्तामात्र की रक्षा के लिए आवश्यक है। इसलिए उसे केवल सतरूप कहते हैं। उसमें ऐसा कोई विशेषत्व नहीं, जो अनुभव में आ सके। इसलिए उसे निर्विशेष कहते हैं। परमात्मा में स्वरूप-शक्ति का विकास ब्रह्म की अपेक्षा अधिक है। इसलिए वह मूर्त है। श्रुतियाँ उसे अगुष्ठ-प्रमाण कहती हैं। वह अन्तर्यामी रूप से सब जीवों के अन्त:करण में विद्यमान है।
भगवान् में स्वरूप शक्ति का पूर्णतम विकास है। ऐश्वर्य, माधुर्य और सौन्दर्य की उनमें पूर्ण अभिव्यक्ति है। वे रस स्वरूप हैं। उनके भी वासुदेव, राम, नारायण, नृसिंह आदि अनेक रूप हैं, जिनमें उनके ऐश्वर्य, माधुर्यदि के विकासक्रम का तारतम्य है। पर उनका श्रीकृष्ण रूप ही सर्वक्षेष्ठ है। वे स्वयं, भगवान् हैं। अन्य भगवद्-स्वरूप उनके अंश और कला हैं।
परमात्म-सन्दर्भ
इसमें परमात्मा के जीव और प्रकृति के साथ सम्बन्ध की आलोचना की गयी है। परमात्मा परब्रह्म का वह अंश है, जिसके द्वारा वह अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड की सृष्टि आदि का कार्य करता है और उनमें व्याप्त रहकर उनका संचालन करता हैं परमात्मा का सम्बन्ध केवल जीव शक्ति और माया-शक्ति से है। जीव शक्ति को तटस्था-शक्ति के। जीव इसी शक्ति का परिणाम है। वे उसी प्रकार भगवान् के अंश हैं, जिस प्रकार स्फुलिंग अग्नि के।
माया
शक्ति को बहिरंगा शक्ति कहते हैं। इसकी परब्रह्म के स्वरूप में स्थिति नहीं है। अचेतन और अन्धकारमय है। इसका भगवान् से उसी प्रकार सम्बन्ध है, जिस प्रकार का धूम्र का अग्नि से। जगत् इसी का परिणाम है। जीव और जगत् का ब्रह्म से अचिंत्य-भेदाभेद का सम्बन्ध है।
श्रीकृष्ण-सन्दर्भ- इस सन्दर्भ में जीव गोस्वामी ने श्रीमद् भागवत के ‘एते चांशकला पुंस: कृष्णस्तु भगवान् स्वयं’ श्लोक के अनुसार सिद्ध किया है कि कृष्ण अवतार नहीं अवतारी हैं अन्य सभी अवतार उनके अंश है। कृष्ण के धाम, परिकर, लीलादि का भी उन्होंने इसमें विस्तार से वर्णन किया है। भगवद्धाम मायातीत है। पर जब भगवान् भूमण्डल पर अवतीर्ण होते हैं, तब पहले उनके धाम का अवतरण होता है। इस प्रकार भगवद्धाम के दो प्रकाश है-प्रकट प्रकाश और अप्रकट प्रकाश। अप्रकट प्रकाश भी दो प्रकार का है- गोलोक अर्थात् वैकुण्ठ के ऊपर स्थित अप्रकट प्रकाश और पृथ्वी पर स्थित अप्रकट प्रकाश। गोलोक के अन्तर्मण्डल को वृन्दावन कहते हैं।
भगवान् की लीला भी दो प्रकार की हैं-प्रकट लीला और अप्रकट लीला। जब लीला ब्रह्माण्ड में गोचरीभूत नहीं होती, तब उसे अप्रकटलीला कहते हैं। जब भगवान् की इच्छा से लीला ब्रह्माण्ड में गोचरीभूत होती है, तब उसी लीला को प्रकट लीला कहते हैं। प्रकट लीला में प्राकृत जगत् के जीवों के समान श्रीकृष्ण का जन्म होता है। जन्म के पश्चात शैशव, वाल्य, कौमार, पोगण्ड और कैशोरावस्था का क्रम चलता है। अप्रकट लीला में कृष्ण नित्य-किशोर है। इसलिए बहुत सी मधुरलीलाएं, जिसका रसास्वादन श्रीकृष्ण को प्रकट लीला में होता है, अप्रकटलीला में सम्भव नहीं है। भगवान् के परिकर दो प्रकार के है- नित्य सिद्ध और साधन-सिद्ध। नित्य सिद्ध परिकर भगवान् या उनकी चिच्छक्ति के ही प्रकाश विशेष हैं उनका सेवाभाव स्वयं सिद्ध है। श्रीकृष्ण के परिकर हैं नन्द-यशोदा, वसुदेव–देवकी, व्रज की गोपियाँ, द्वारका की महिषियाँ, व्रज के गोप और द्वारका-मथुरा के यादवगण। नन्द-यशोदा का श्रीकृष्ण के प्रति वात्सल्यभाव अनादिकाल से स्वयं-सिद्ध है, जन्मजात नहीं। इसी प्रकार अन्य परिकारों का अपना-अपना भाव भी अनादिकाल से स्वयं-सिद्ध है।
व्रज के गोप और द्वारका-मथुरा के यादवगण श्रीकृष्ण के आविर्भाव विशेष है। व्रज की गोपियाँ और द्वारका-मथुरा की महिषियाँ स्वरूप-शक्ति की वृत्ति विशेष हैं। स्वरूप-शक्ति की तीन वृत्तियाँ है- संधिनी, संवित और ह्लादिनी, जो क्रमश: भगवान् के सत्, चित् और आनन्द अंशो से सम्बन्धित है। संधिनी से संवित और संवित से ह्लादिनी श्रेष्ठ है। ह्लादिनी की ही वृत्ति है भक्ति और भक्ति की परमधनीभूत मूर्ति हैं राधा।
श्रीकृष्ण रसस्वरूप हैं। रस आस्वाद्यं है। जो आस्वाद्य है वही मधुर है। इसलिए रस स्वरूप श्रीकृष्ण माधुर्य स्वरूप हैं। माधुर्य ही उनकी भगवत्ता का सार है। उनका ऐश्वर्य उनके माधुर्य से पूर्णत: आच्छादित है। श्रीकृष्ण का माधुर्य असीम है, राधा का प्रेम असीम है। असीम होते हुए भी कृष्ण का माधुर्य राधा के प्रेम से और राधा का प्रेम कृष्ण के माधुर्य से उच्छवसित होता है। इसीलिए श्रीकृष्ण का माधुर्य असीम होते हुए भी निरन्तर वर्धमान होने के कारण नित्य नवीन है। रस स्वरूप श्रीकृष्ण सर्वोत्कृष्ट भक्ति रस का आस्वादन करने के लिए सब प्रकार से स्वतन्त्र होते हुए भी भक्तों के अधीन हैं।
भक्ति-सन्दर्भ
इसमें भक्ति के स्वरूप, प्रकार, अंग और गोपानादि का वर्णन किया गया है। भक्ति है ईश्वर में परानुरक्ति। यह जीव की अपनी शक्ति नहीं, भगवान् की ह्लादिनी शक्ति की वृत्ति है। गुणातीत ह्लादिनी शक्ति की वृत्ति होने के कारण यह निर्गुण हैं, प्रपञ्चातीत है, भगवान् इसे जीव के चित्त में निक्षिप्त कर उसे आनन्दित करते हैं और स्वयं भी आनन्दित होते हैं।[1] भक्त्यानन्द भगवान् के स्वरूपानन्द से भी श्रेष्ठ है।
भक्ति कर्म, ज्ञान और योग से श्रेष्ठ है। भक्ति की प्रारम्भिक अवस्था में ज्ञान और योग सहायक हैं, क्योंकि वे सांसारिक विषयों की कामना से मुक्त हैं। भक्ति की उच्चतर अवस्था में वे बाधक हैं, क्योंकि मुक्ति की कामना से वे मुक्त नहीं हैं, पर किसी भी अवस्था में वे भक्ति का आवश्यक अंग नहीं है। कर्म, ज्ञान और योग फल की प्राप्ति के लिए भक्ति की अपेक्षा रखते हैं। भक्ति किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रखती। यह परम स्वतन्त्रता है।
वर्णाश्रम-धर्म भक्ति का अंग नहीं है। इससे स्वर्ग की प्राप्ति होती है, मुक्ति की नहीं। निष्काम-कर्म से मुक्ति की प्राप्ति होती है, श्रीकृष्ण की प्रेम सेवा की नहीं। कर्म के सम्यक् त्याग में भी भक्ति का आकार ही है, प्राण नहीं। भक्ति का प्राण है आत्यन्ति की श्रद्धा और श्रीकृष्ण की प्रेम सेवा की बलवती लालसा।
भगवत्-साक्षात्कार भक्ति से ही होता है, अन्य किसी साधन से नहीं। यदि हृदय में भक्ति न हो और साक्षात्कार हो तो वह साक्षात्कार भी असाक्षात्कार के समान है। उससे भगवान् के माधुर्य का आस्वादन नहीं होता, उसी प्रकार जिस प्रकार पित्त दूषित जिह्ना से मिसरी के मिठास का आस्वादन नहीं होता-
“निरूपाधि प्रीत्यास्पदतास्वभावस्य प्रियत्वधर्मानुभवं बिना तु साक्षात्कारोऽप्यासाक्षात्कार एव। माधुर्य बिना दुष्ट जिह्नया खण्डस्येव[2]
भक्ति साधन भी है, साध्य भी। साधन-भक्ति साध्य-भक्ति की अपरिपक्वावस्था है। साधन-भक्ति के चौसठ अंग है, जिनका पर्यवसान नवधा-भक्ति में होता है। नवधा-भक्ति के अंग है-श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म-निवेदन। इनमें भी नाम कीर्तन सर्वप्रधान है। नाम कीर्तन के बगैर भक्ति का कोई भी अंग पूर्ण नहीं है।
भक्ति दो प्रकार की है-वैधी और रागानुगा। वैधी-भक्ति के साधक भजन में प्रवृत्त होते हैं शास्त्र-विधि के भय से और सांसारिक दुखों से परित्राण पाने के उद्देश्य से। रागमार्ग् के साधक भजन में प्रवृत्त होते हैं। श्रीकृष्ण में राग, प्रीति या आसक्ति के कारण उनकी सेवा के लोभ से।
रागानुगा-भक्ति रागात्मिका भक्ति की अनुगता है। रागात्मिका भक्ति के आश्रय हैं नन्द-यशोदा-राधा-ललितादि, जो श्रीकृष्ण की स्वरूप-शक्ति के मूर्त विग्रह हैं और अनादिकाल से व्रजधाम में व्रज-परिकरों के रूप में विराजमान हैं।
व्रज में श्रीकृष्ण के परिकर चार प्रकार के हैं-दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर। दास्य, सख्य वात्सल्यभाव के परिकरों की कृष्ण-सेवा उनके सम्बन्ध के अनुरूप होती है। इसलिए वह सम्बन्ध रूपा कहलाती है। परन्तु व्रजसुन्दरियों की रागात्मिका-भक्ति सम्बन्ध की कोई अपेक्षा नहीं रखती। वह एकमात्र श्रीकृष्ण-प्रीति की कामना की अपेक्षा रखती है। इसलिए वह कामरूपा कहलाती है।
रागात्मिका-भक्ति के समान रागानुगा भक्ति भी दो प्रकार की है- सम्बन्धानुगा और कामानुगा। कामानुगाओं की कामानुगा भक्ति भी दो प्रकार की है-सम्भोगेच्छामयी और तत्तद्भावेच्छामयी।सम्भोगेच्छामयी भक्ति में श्रीकृष्ण के साथ सम्भोग की इच्छा रहती है। सम्भोग की इच्छा रखने वाले भक्तों को व्रज में व्रजेन्द्रनन्दन की सेवा नहीं मिलती, क्योंकि व्रज में स्वसुख वासना है ही नहीं। उन्हें द्वारका की प्राप्ति होती है।
साधन दो प्रकार का है-अन्तर और बाह्य। अन्तर-साधन का सम्बन्ध मन से है, बाह्य-साधन का देह ओर बाह्म इन्द्रियों से। रागानुगा श्रवण अन्तर-साधन प्रधान है। लीला-स्मरण इसका मुख्य अंग है। पर श्रवण कीर्तनादि बाह्म-साधन इसमें उपेक्षनीय नहीं है। बाह्य-साधन से अन्तर साधन की पुष्टि होती है। बाह्य-साधन से यथावस्थित पा0चभौतिक देह से। अन्तर साधन होता है। अन्तश्चिन्तित सिद्ध देह से।
प्रीति-सन्दर्भ
प्रति सन्दर्भ में परमपुरुषार्थ का निरूपण किया गया है। परमतम पुरुषार्थ है। भगवत् प्रीति। प्रीति शब्द सुख और प्रियता दोनों का व्यञ्जक है। प्रियता में सुख का धर्म विद्यमान है, पर सुख को प्रियता नहीं कहा जा सकता। सुख का तात्पर्य एकमात्र अपने उल्लास से है, प्रियता का तात्पर्य प्रीति के विषय या प्रियजन के उल्लास के कारण अपने हृदय में जो उल्लास होता है उससे है। सुख के मूल में किसी का आनुकूल्य या सुख विधान करने की स्पृहा नहीं रहती, इसलिए सुख का विषय नहीं होता। प्रियता के मूल में प्रियजन का सुख-विधान करने की स्पृहा रहती है, इसलिए उसका विषय होता है।
भगवत् प्रीति की प्रथम अवस्था में देहादि की आसक्ति जाती रहती है। भगवत् प्रीति के पूर्णाविर्भाव में भगवान् में परमावेश और परमानन्द पूर्णता की उत्पत्ति होती है। भक्त के चित्त में आविर्भूता प्रीति उसके चित्त में संस्कार-विशेष उत्पन्न कर उसे क्रमश: रति, प्रेम प्रणय, मान, स्नेह, राग, अनुराग और महाभाव के स्तर तक ले जाती है। रति में उल्लास की अधिकता होती है। रति के उत्पन्न होने पर केवल भगवान् में ही प्रयोजन-बुद्धि होती है। भगवान् के अतिरिक्त और सभी पदार्थ तुच्छ प्रतीत होने लगते हैं।
प्रेम में कृष्ण के प्रति ममता अधिक होती है। प्रेम उत्पन्न होने पर यदि प्रीति भंग होने का कारण भी उपस्थित हो तो उसके स्वरूप में किसी प्रकार की कमी नहीं आती। ममता किस प्रकार प्रीति को समृद्ध करती है इसका उदाहरण देते हुए मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि ममतायुक्त पालतू मुर्गे को विल्ली के खा जाने से उसके मालिक को जितना दुख होता है, उतना ममता शून्य चूहे को चटक पक्षी के खा जाने से नहीं होता। प्रेम लक्षणा-भक्ति में ममता के आधिक्य के कारण ममता को ही भक्ति कहा गया है।
प्रणय में विश्वास की, विश्रंभ की प्रचुरता होती है। प्रणय में सम्भ्रम के लिए स्थान नहीं रहता, क्योंकि इसमें अपने मन, प्राण, बुद्धि, देह परिच्छदादि के प्रिय के मन, प्राण, बुद्धि, देह, परिच्छदादि से अभिन्न होने की बुद्धि होती है।
मान में प्रियतातिशय के कारण प्रणय कौटिल्याभासयुक्त वैचित्री धारण करता है। मान उपस्थित होने पर भक्त के प्रणय कोप से भगवान् भी प्रेममय भय को प्राप्त होते है-
“यस्मिन जाते श्रीभगवानपि तत्प्रणयकोपात् प्रेममयं भयं भजते।”
स्नेह में चित्त अत्यन्त द्रवित होता है। स्नेह के उदय होने पर भगवान् के सम्बन्धाभास में ही महावाष्पादि विकार, प्रिय-दर्शनादि से अतृप्ति और प्रियतम के अनन्त सामर्थ्यवान होते हुए भी किसी के द्वारा उनके अनिष्ट की आशंका का जन्म होता है।
राग में स्नेह अतिशय अभिलाषात्मक होता है। राग उत्पन्न होने पर प्रियतम का क्षणिक विरह अत्यन्त असह्य होता है। प्रियतम के संयोग में परम दुख भी सुख रूप में प्रतीत होता है और वियोग में परमसुख भी दुख रूप में प्रतीत होता है। अनुराग की अवस्था में राग प्रिय का नवीन नवीन रूप में अनुभव कराता है और स्वयं भी नवीन-नवीन होता है। अनुराग के उदय होने पर परस्पर का अत्यन्त वशीभाव, प्रेमवैचित्य[3] कृष्ण सम्बन्धी अप्राणी में भी जन्म लेने की लालसा और विच्छेद में अतिशय स्फूर्ति का अनुभव होता है।
महाभाव में अनुराग असमोर्द्ध उन्मादक चमत्कारित्व को प्राप्त होता है। इस अवस्था में श्रीकृष्ण के संयोग में पलक का पड़ना भी असह्य हो जाता है और कल्प के बराबर समय क्षणभर जैसा प्रतीत होता है, वियोग में एक क्षण भी कल्प जैसा लगता है। योग-वियोग दोनों अवस्थाओं में महाउद्दीप्त [4] सात्वि भाव उत्पन्न होते हैं।[5] प्रीति भगवत् स्वभाव-विशेष की सहायता से प्रीतिमान व्यक्ति में अनुग्राह्याभिमान, अनुग्राहकाभिमान, मित्राभिमान या प्रियाभिमान उत्पन्न करती है।
अनुग्राह्याभिमान – विशिष्ट, भक्त भगवान् में ममताहीन होते हैं या ममतावान्। ममताहीन भगवान् को ब्रह्म या परमात्मा के रूप में जानते हैं। इनकी प्राप्ति ज्ञान-भक्ति कहलाती है। इन्हें शान्त भक्त कहते हैं।
अनुग्राह्याभिमान- विशिष्ट ममतावान् भक्त भगवान् को अपना प्रभु मानते हैं। इनकी रति दास्य-रति कहलाती है।
अनुग्राहकाभिमान- विशिष्ट भक्तों का भगवान् में पुत्रादि-भाव होता है। इनकी रति वात्सल्य-रति कहलाती है।
मित्राभिमान भक्त भगवान् को अपना मित्र या सखा मानते हैं। इनकी रति सख्य रति कहलाती है।
प्रियाभिमानि भक्तों में भगवान् के प्रति कान्ताभाव होता है। इनकी रति को मधुरा रति कहते हैं।
शानत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर पञ्चविध रति को स्थायीभाव कहते हैं। विभाव, अनुभाव सात्विक और व्याभिचारीभाव के सम्मिलन से इनकी रस में परिणति होती है। इसलिए शान्त, दास्य, सख्य,वात्सल्य, मधुर-भेद से रस पञ्चविध है। इसके अतिरिक्त हास्यादि भेद से रस के सात और प्रकार है।
शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर-रस उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। मधुर-रस सबसे श्रेष्ठ है। मधुर व उज्ज्वल रस में कान्तरूप से स्फूर्तिमान श्रीकृष्ण विषयालम्बन है, उनकी प्रेयसी वर्ग आश्रयालम्बन हैं। कृष्ण-प्रेयसी स्वकीया परकीया भेद से दो प्रकार की हैं। रुक्मिणी आदि स्वीयाकान्ता हैं। श्रीराधादि परमस्वीया होते हुए भी प्रकटलीला में परकीयारूप में प्रतीयमान है। स्वकीया प्रेयसियों में विवाह विधि की अपेक्षा के कारण अनुराग होते हुए भी उतना प्रबल नहीं है, जितना परकीया कान्ताओं में। व्रज-सुन्दरियाँ प्रकटलीला में विवाह-विधि, इहलोक, परलोक और वेदधर्मादि की अपेक्षा न कर केवल श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनुराग के वशीभूत हो उन्हें आत्मसमर्पण करती हैं।[6]

व्रजसुन्दरियों का परकीयात्व प्राकृत जगत् के अधर्ममय, घृणित परकीयात्व के समान नहीं है। व्रजसुन्दरीगण श्रीकृष्ण की नित्यप्रेयसी हैं। उनका प्रबलतम अनुराग आस्वादन करने के लिए श्रीकृष्ण अपनी अघटन-घटना-पटीयसी योगमाया शक्ति द्वारा प्रकटलीला में उनकी परकीया नायिका के रूप में प्रतीत कराते हैं। प्रकटलीला में अन्य गोपों के सहित उनका विवाह मायिक होता है। जब वे श्रीकृष्ण के निकट रासादि में जाती है, तब योगमाया के प्रभाव से उनकी योगमाया-कल्पित मूर्ति घर पर रह जाती है।
प्राकृत जगत् की व्यभिचारिणी रमणी परपुरुष का संग अपने सुख के लिये करती है। व्रजसुन्दरियों में स्वमुख-वासना का लेश भी नहीं है। श्रीकृष्ण के साथ व्रजसुन्दरियों का सम्बन्ध वैध-अवैध किसी भी जागतिक सम्बन्ध के अनुरूप नहीं है। वह शुद्ध अनुरागमय है। उनके चित और इन्द्रियाँ कृष्णनुराग से विभावित हैं। उनकी सारी चेष्टाएं उस अनुराग की अभिव्यक्ति मात्र हैं और श्रीकृष्ण के सुख के लिए हैं। उनका श्रीकृष्ण के साथ अनुराग-सिद्ध दाम्पत्य है।
उज्ज्वल रस में नायक नायिका का सम्भोग काममय नहीं है। कामक्रीड़ा से उनका बाह्य साम्य मात्र है। उसमें आलिंगन, चुम्बनादि की जो बाह्य चेष्टाए हैं वे नृत्यादि की तरह प्रीति के अनुभाव और उसका बाह्य प्रकाश मात्र है।
सर्वसम्बादिनी
यह भागवत सन्दर्भ के अन्तर्गत प्रथम चार सन्दर्भो की अनुव्याख्या या टीका है। इसे भागवत-सन्दर्भ की प्रपूर्ति कहा गया है, क्योंकि भागवत सन्दर्भ में दार्शनिक सिद्धान्त और शास्त्र-प्रमाण से सम्बन्धित, जो स्थल असम्पूर्ण या अस्पष्ट रह गये, उनकी जीव गोस्वामी ने बहुत से नये शास्त्र-प्रमाण और सिद्धान्त-विचार द्वारा इसमें सम्पूर्ति की है। उसमें उन्होंने वेद, वेदान्त, न्याय, मीमांसा, सांख्य, पातञ्जल, स्मृति, तन्त्र, पुराण, निरूक्त, व्याकरण प्रभृति सर्वशास्त्रों का मन्थन कर सर्वसम्वादपूर्ण, अति सारगर्भ वैष्णव-सिद्धान्त-समूह समाविष्ट कर रखा है। सम्भवत: इसीलिए इसका नाम सर्वसम्वादिनी रखा है। यह ग्रन्थ मूलग्रन्थ भागवत सन्दर्भ से भी अधिक महत्त्व का है।
संक्षेपवैष्णवतोषणी
सनातन गोस्वामी की श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध पर लिखी वैष्णवतोषणी टीका से यह संक्षिप्तिकृत है। इसके पृथक् रूप से लिखे जाने के वाद सनातन गोस्वामी की टीका का नाम हुआ वृहद्वैष्णतवोषणी और इसका नाम हुआ लघुवैष्णवतोषणी या संक्षिप्त-वैष्णवतोषणी। इसके उपसंहार में दिये गये श्लोक के अनुसार इसकी रचना 1582 ई. में समाप्त की गयी।
क्रम-सन्दर्भ
यह जीव गोस्वामी द्वारा की गयी समग्र श्रीमद्भागवत की टीका है। सर्वसम्वादिनी में क्रम-सन्दर्भ का उल्लेख है। और वैष्णवतोषणी में सर्वसम्वादिनी का। इससे प्रमाणित है कि क्रम-सन्दर्भ की रचना वैष्णवतोषणी के पूर्व अर्थात् सन् 1582 से पूर्व हुई।
गोपालचम्पू
गोपालचम्पू जीव गोस्वामी के शेष जीवन की विशेष कृति और भागवत-सन्दर्भ के समान उनके जीवन का प्रमुख कीर्तिस्तम्भ है। यह पूर्व और उत्तर दो विशाल खण्डों में विभक्त है। पूर्व खण्ड में श्रीमद्भागवत के आधार पर श्रीकृष्ण की बाल्यलीला का और उत्तर खण्ड में मथुरा और द्वारका लीला का वर्णन है। चम्पू-काव्य के अनुसार इसमें गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग किया गया है। यद्यपि इसका मूल आधार है श्रीमद्भागवत में वर्णित वृन्दावन-मथुरा-द्वारका लीला, इसमें उन लीलाओं के विस्तृत वर्णन के साथ-साथ अनेक नई लीलाओं का भी वर्णन है, जिनका श्रीमद्भागवत में परीक्षित को सुनाई गयी सात दिन की कथा में समावेश सम्भव नहीं था। इसमें श्रीकृष्ण की प्रकट और अप्रकट लीलाओं का सुन्दर सम्मिश्रण है।
इसकी एक असाधारण विशेषता यह है कि यह लीला ही नहीं, कवित्त और दार्शनिक सिद्धान्त की दृष्टि से भी परिपूर्ण है। कृष्णदास कविराज ने चैतन्य-चरितामृत में इसके सम्बन्ध में लिखा है-
श्रीगोपालचम्पू नामे ग्रन्थ महाशूर। नित्यलीला स्थापना जाहे ब्रजरसपूर॥[7]
अर्थात् श्रीगोपालचम्पू नामक ग्रन्थ महासूर है। भाषा, काव्य, सिद्धान्त आदि की दृष्टि से यह महागम्भीर और सबको पराजित करने वाला है। इसमें अप्रकट प्रकाश का वर्णन होते हुए भी व्रजरस, अर्थात् भौम वृन्दावन को प्रधानता की स्थापना की गयी है।
भौम वृन्दावन की प्रकटलीला के सर्वोत्कर्षमयी होने का कारण है योगमाया द्वारा श्रीकृष्ण की स्वरूपशक्ति, उनकी परम स्वीया कान्तागण की परकीया-अभिमानिनी रूप में प्रतीति करा श्रीकृष्ण को परमास्वाद्य परकीया-रस का आस्वादन कराना। यह रस परमोज्ज्वल और सर्वथा अनवद्य है। इस रूप में इसका प्रतिपादन श्रीमद्भागवत में रासलीला के उपसंहार में परीक्षित-शुक सम्वाद में स्पष्टरूप से किया गया है। जीवगोस्वामी ने इस ग्रन्थ में परकीया-रस का ही प्रतिपादन किया है। पर उत्तर चम्पू के पैंतीस वें पूरण में उन्होंने श्रीराधा-माधव-विवाह-प्रसंग का वर्णन किया है। इसके कारण कुछ लोगों की धारणा है कि उन्होंन